कोई टिकट पक्की कर रहा हैं….तो कोई अपनी जीत?

दुर्ग। चुनावी वर्ष के लिहाज से दुर्ग शहरी व दुर्ग ग्रामीण दोनों विधानसभा सीटों के विधायक चुनावी मोड पर आ चुके है, किंतु अलग-अलग तरीकों से। दुर्ग विधायक अरुण वोरा जहाँ दिल्ली जाकर कांग्रेस के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सहित अन्य बड़े नेताओं से मेल मुलाकात कर रहे हैं, वही दुर्ग ग्रामीण विधायक व केबिनेट मंत्री ताम्रध्वज साहू अपने क्षेत्र के मतदाताओं को साधने में लग गए हैं। दुर्ग ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र में विभिन्न कार्यक्रमो का आयोजन कर शिरकत कर रहे हैं, वही अपने क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायतों के सरपंचों को दो बसों में प्रयागराज तीर्थ यात्रा करा रहे हैं। केबिनेट का दर्जा प्राप्त दोनों विधायक कांग्रेस के बड़े प्रादेशिक नेता है और दुर्ग कांग्रेस की राजनीति इन्ही के इर्दगिर्द घूमती है। भले ही दोनों नेताओं के तरीके अलग अलग हो, पर मंजिल अपनी अपनी चुनावी नैय्या पार लगाना ही है। अरुण वोरा दिल्ली से अपनी विधायकी पक्की करा लेना चाहते है तो ताम्रध्वज साहू ग्रास रूट को सींच कर विधायकी का पौधा पल्लवित करना चाह रहे हैं।
यह ध्रुव सत्य है, चुनावी समर में जनता ही हार और जीत तय करते है। लिहाजा जनता को साधना चुनाव जीतने की प्राथमिक कदम है। जनता को विकास कार्य चाहिए। उसे रोटी, कपड़ा, मकान के अलावा सड़क, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरतें पूर्ण चाहिए। कोई जनप्रतिनिधि यदि अपनी जनता को चलने के लिए अदद सड़क नही दे सकता, पीने व सिंचाई के लिए पानी नही दे सकता। इलाज की सुविधा नही दे सकता। सफाई व्यवस्था प्रदान नही कर सकता, तो वह काहे का जनप्रतिनिधि। सिर्फ सरकारी मलाई खाने के लिए बने नेताओ को जनता लंबे समय तक बर्दाश्त नही करती। दुर्ग शहरी व ग्रामीण दोनों ही सीटों के विधायक इन बातों से भलीभांति वाकिफ है। इनका सुदीर्घ सियासी अनूभव है। जनता की नब्ज पर उंगली रखने में माहिर हैं। लिहाजा उनकी चुनावी दक्षता, कौशल व रणनीति जमीन पर दिखनें
लगी है।
दुर्ग शहर की दुर्दशा को लेकर विधायक अरुण वोरा का चिंतित होने लाजिमी है। दुर्ग नगर निगम में कांग्रेस की शहरी सत्ता है। विधायक अरुण वोरा की महापौर धीरज बाकलीवाल से गलबहियां मशहूर है। ऐसे में नागरिक सुविधाओ में कमी का ठीकरा शहर विधायक पर फूटना भी लाजिमी है। सड़क, पेयजल, स्वास्थ, सफाई जैसे मसलों पर दुर्ग की जनता असंतुष्ट है, आगामी साल में उन्हें साधना नगर विधायक के लिए जरूरी है।
दूसरी ओर सियासी जमीन के स्तर पर अरुण वोरा को कांग्रेसियो का समुचित साथ नही मिल रहा जाए। स्व वासुदेव चन्द्राकर की विरासत संभाले नेता अपनी अलग लाइन चला रहे हैं। स्व मोतीलाल वोरा के न रहने से वासुदेव गुट के अलावा चौबे गुट भी अरुण को मजबूत करने में ज्यादा ध्यान नही दे रहे। नगर निगम में महापौर धीरज बाकलीवाल के अलावा सभापति राजेश यादव का भी दबदबा है। राजेश यादव का परिवार यूं तो परम्परगत रूप से वोरा गुट के विश्वस्त सिपाहसालार माने जाते रहे हैं, पर बदलते राजनीतिक परिदृश्य में अब के दोस्त में कब ठन जाए, कौन बता सकता है।

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Author: mithlabra

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