भगवाधारी साधु का 5वीं की किताब में अपमान, शंकराचार्य जी ने फाड़ा पाठ, आखिर क्यों बात बात पर धर्म से खिलवाड़ ?

कवर्धा। कबीरधाम-राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद छत्तीसगढ़ द्वारा प्रकाशित की गई कक्षा 05 वीं. की पुस्तक हिंदी, संस्कृत एवं छत्तीसगढ़ी एक पृष्ठ को शंकराचार्य स्वामिश्री अविमुक्तेश्वरानंद: सरस्वती जी महाराज द्वारा सार्वजनिक रूप से फाड़ दिया गया।
आप सोच रहे होंगे कि पुस्तक, जिससे हमें शिक्षा मिलती है उसे इस तरह सार्वजनिक रूप से फाड़ देना आखिर क्यों ? इसका जवाब आपको एक विरोधी स्वर में मिलेगा। आज के भारत में मनोरंजन शिक्षा और तमाम चीजों के साथ धार्मिक भावनाओं का खिलवाड़ करना आम हो गया है। शंकराचार्य जी महाराज ने बीड़ा उठाया कि इस तरह धार्मिक अपमान अब नहीं सह सकेंगे।
दरसअल ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य जी दो दिवसीय कवर्धा प्रवास पर पहुँचे थे जहाँ दुशरे दिन ग्राम जुनवानी में आयोजित पंच कुण्डीय रुद्र महायज्ञ एवं श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ में दर्शन व आशीर्वचन देने पहुँचे थे जहां शंकराचार्य महाराज को राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद छत्तीसगढ़ द्वारा प्रकाशित की गई कक्षा 05 वीं. की पुस्तक हिंदी, संस्कृत एवं छत्तीसगढ़ी की पुस्तक देते हुए एक विशेष पृष्ठ में प्रकाशित लेख से अवगत कराते हुए ध्यान आकर्षण कराया।
ऐसा ही एक पाठ्यपुस्तक में शिक्षा के नाम पर साधुओं को कपटी व्यक्ति बताया गया है। यह कक्षा 5 कि वह पुस्तक है जो नि:शुल्क वितरण की जाती हैं। शंकराचार्य जी महाराज ने इस पाठ का विरोध कड़े स्वर में किया उन्होंने बताया कि इस पुस्तक में ‘चमत्कार’ नाम का एक पाठ है, जिसमें साधु की वेशभूषा दाढ़ी मूछ में एक व्यक्ति का चित्रण किया गया है। इस पाठ में बताया जा रहा है कि साधुओं से सावधान ! साधु ठग होते हैं। मतलब बच्चों के मन में ऐसी भावना भरी जा रही हैं, जिससे वह पहले ही यह माल लेकर साधु गलत होते हैं। बच्चों के मन में जहर घोला जा रहा है।
आधुनिक शिक्षा की बात करते हुए शंकराचार्य महाराज ने कहा कि पुराना ही जमाना सही था, जब घर आकर स्वयं शिक्षक बच्चों को अपने साथ ले जाते थे व कभी या पलट कर नहीं कहते थे कि आपका बच्चा क्या कर रहा है और क्या नहीं। आज की शिक्षा की बात करें तो मां व बाप का इंटरव्यू होता है, इससे आकलन किया जाता है, बच्चे के माता-पिता कितने समझदार हैं। माता-पिता को जो नहीं आता वह बच्चे को स्कूल में सिखाया जाता है और कहा जाता है माता-पिता से पूछना। माता-पिता से जवाब नहीं मिलने पर बच्चा उन्हें मूर्ख समझने लगता है। इस तरह की सीख देने वालों को बच्चा विद्वान मानता हैं।


अगर पहले पढ़ाई की बात करें तो माता-पिता ही बच्चों के हीरो होते थे। पहले की पढ़ाई में मन एकता व श्रद्धा से भर जाता था। आज की पढ़ाई की शुरुआत ही अश्रद्धा से होती है। आज की पढ़ाई से सर्वप्रथम माता-पिता के लिए बच्चों के मन में अश्रद्धा जाती है फिर साधु-संतों के लिए। इसके बाद राजनीतिक लोग आ जाते हैं धर्मांतरण हो रहा है नहीं होना चाहिए। एक धर्मांतरण करता है तो दूसरा उसे बचाने का ढोंग करता है। राजनीतिज्ञ लोग धर्म के मामले में सामने आ जाते हैं उनका धर्म से क्या लेना देना। अपने व्यक्तिगत जीवन में भर धर्म का पालन करें यही उनके लिए काफी है।
शंकराचार्य महाराज जी ने कहा कि धर्म और राजनीति दो अलग चीजें हैं इसलिए राजनीति से जुड़े लोगों को धर्म के बीच में नहीं आना चाहिए। क्या साधु-संत राजनीति करने आपकी जगह आ जाते हैं। आचार्ययों का दायित्व है, धर्म के प्रति बरगलाने वाले लोगों पर नजर रखें। गांव गांव से धर्म के प्रति लोग खड़े हो रहे हैं। वही, धर्म के विरुद्ध जो कार्य हो रहे हैं, उनकी लिखित रिपोर्ट भी आचार्यों के पास पहुंच रही है।
इस किताब का लेखक मुस्लिम है, ‘जाकिर अली रजनीश’ तभी तो उसने यह नहीं लिखा कि ‘फकीर’ की वेशभूषा में ‘कपटी’ या ‘आतंकवादी’। शंकराचार्य जी ने कहा कि हिंदू धर्म के विरुद्ध यह एक षड्यंत्र है। यह किताब यदि बच्चों को पढ़ने दी जा रही है तो इसका विरोध करिए। बच्चे हम गुरुकुल में भेज देंगे लेकिन ऐसी पढ़ाई हम नहीं करने देंगे। आप यदि सोचते हैं कि अंग्रेजी स्कूल में भेजने से आपका बच्चा कलेक्टर बन जाएगा तो गलत सोच है। किंडर गार्डन में अगर बच्चे को भेजोगे तो ईसाई बन जाएगा। खुद सोच कर देखिए कि श्रीमद्भागवत कथा को लिखने वाले कौन से किंडर गार्डन में पढ़े थे। उन्होंने गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण की और विद्वान हुए। हमारे सामने गुरुजी एक उदाहरण है जो संपूर्ण विद्वान और ज्ञानी थे। उन्होंने गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण की और उनके भाषण को पूरे विश्व में आज आदर के साथ देखा जाता है। ऐसी परिस्थिति में आपको इस तरह की जो पुस्तकों को इनकार करना पड़ेगा।
शंकराचार्य महाराज ने रामायण का उदाहरण देते हुए कहा कि रावण साधु के वेश में आकर सीता माता को ले जाता है यह एक ठगी का उदाहरण है। हमारा बच्चा रामायण पढ़ के ही सीख लेता है, तो इस तरह के पाठ की क्या आवश्यकता है। इस तरह के पाठ से किसी का भला नहीं होने वाला हैं। बच्चों के दिमाग में भावनाएं बैठ जाएगी कि साधु संतों के वेशभूषा में ठग होते हैं। यही उद्देश जाकिर अली जैसे लोगों का है। दुर्भाग्य से सरकार इन्हीं का साथ दे रही है, जिसका हम कड़ा विरोध करते हैं। भगवान शंकराचार्य जी ने कहा कि थोड़ी देर की भी सज्जन की संगति फायदेमंद होती है। इसलिए सज्जन की संगति करनी चाहिए।
शंकराचार्य महाराज जी ने कहा मनोरंजन के लिए फिल्म धारावाहिक आदि को हम देखते और सुनते हैं। धर्म को ले करके उसमें यदि गलत दिखाया जाता है, तो आप उसका विरोध करिए। मत देखिए वो चीज जो आपके धर्म, संस्कृति सभ्यता को चोट पहुंचाती है। वरना ऐसा मनोरंजन करते – करते एक दिन रोना पड़ेगा। इन सब चीजों के प्रति काफी संवेदनशील होने की आवश्यकता है।
शंकराचार्य जी ने कवर्धा क्षेत्र के वकील से अपील की कि यदि कोई भी इस पाठ्य पुस्तक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराना चाहता है तो एक पैनल बनाकर के इसके खिलाफ मुफ्त में मुकदमा लड़े। इस पाठ को इस किताब से हटवाया जाए। वही, जाकिर अली के इस पाठ पर सवाल उठाते हुए शंकराचार्य जी ने कहा इस पाठ का उद्देश्य ठगी से बचाना है तो फकीर, राजनेता और पुलिस भी तो शामिल होने चाहिए थे ना ? यह बच्चों के दिमाग पर बुरा असर डालने के लिए है। सन्यासी को ही इसमें टारगेट क्यों किया गया ? इसका जवाब दिया जाए।

mithlabra
Author: mithlabra

Leave a Comment